पंचायतों के अधिकार और प्रधानों के सम्मान के लिए देहरादून में आर-पार की लड़ाई! सचिवालय घेराव में गरजे सितारगंज के ग्राम प्रधान, 20 हजार मानदेय से लेकर ग्राम प्रधान निधि तक की उठाई मांग,
09 अक्टूबर, 2026
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मनरेगा में ऑफलाइन हाजिरी, अकुशल श्रमिक को 600 और कुशल को 800 रुपये मजदूरी देने की मांग; 29 विभाग पंचायतों को सौंपने और विकास कार्यों में ग्राम पंचायतों को अधिकार देने पर जोर।
देहरादून/सितारगंज/उधमसिंहनगर:(चरनसिंह सरारी) गांवों के विकास की जिम्मेदारी निभाने वाली ग्राम पंचायतों को अधिक अधिकार, पर्याप्त बजट और पंचायत प्रतिनिधियों को सम्मानजनक मानदेय दिलाने की मांग अब जोर पकड़ने लगी है। इसी कड़ी में ग्राम प्रधान संघ अध्यक्ष रेशम सिंह के नेतृत्व में 8 अक्टूबर 2026 को देहरादून में ग्राम प्रधानों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए सचिवालय घेराव और जोरदार प्रदर्शन किया। इस आंदोलन में विकासखंड सितारगंज से बड़ी संख्या में ग्राम पंचायत प्रधान देहरादून पहुंचे और प्रदेशभर से जुटे पंचायत प्रतिनिधियों के साथ अपनी मांगों को लेकर आवाज बुलंद की। परेड ग्राउंड में एकत्रित होने के बाद प्रधान सचिवालय की ओर रवाना हुए और पंचायतों से जुड़े मुद्दों पर सरकार का ध्यान आकर्षित करते हुए अपनी एकजुटता का प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के दौरान ‘प्रधान संगठन एकता जिंदाबाद’ के नारों से माहौल गूंज उठा। ग्राम प्रधानों ने साफ किया कि गांवों में विकास कार्यों को गति देने के लिए केवल जिम्मेदारियां सौंपना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पंचायतों को अधिकार, बजट और निर्णय लेने की स्वतंत्रता भी मिलनी चाहिए। संगठन ने सरकार के सामने दस सूत्रीय मांगपत्र सहित पंचायतों की वित्तीय व्यवस्था, प्रशासनिक अधिकारों, श्रमिकों की मजदूरी और जनप्रतिनिधियों की सुविधाओं से जुड़े कई अहम मुद्दे रखे।
-मनरेगा में ऑफलाइन हाजिरी और मजदूरी बढ़ाने की मांग
ग्राम प्रधानों की प्रमुख मांगों में मनरेगा और वीबीजी-रामजी योजना में श्रमिकों की उपस्थिति दर्ज करने की व्यवस्था ऑफलाइन किए जाने का मुद्दा शामिल रहा। प्रधानों का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में तकनीकी और नेटवर्क संबंधी दिक्कतों के चलते ऑनलाइन उपस्थिति की व्यवस्था कई बार परेशानी का कारण बनती है। ऐसे में स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए व्यवहारिक व्यवस्था लागू की जानी चाहिए, जिससे श्रमिकों को रोजगार मिलने और विकास कार्यों के संचालन में अनावश्यक बाधाएं न आएं। संगठन ने अकुशल श्रमिकों की मजदूरी बढ़ाकर 600 रुपये और कुशल श्रमिकों की मजदूरी 800 रुपये प्रतिदिन किए जाने की मांग भी उठाई। प्रधानों ने कहा कि मजदूरी की दरों में बढ़ोतरी से श्रमिकों को राहत मिलेगी और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार से जुड़े कार्यों को भी मजबूती मिल सकेगी।
-राज्य और केंद्रीय वित्त की धनराशि बढ़ाने पर जोर
ग्राम पंचायतों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में सीमित बजट और विकास कार्यों के लिए पर्याप्त धनराशि का अभाव भी शामिल है। इसी को लेकर प्रधानों ने राज्य वित्त और केंद्रीय वित्त से मिलने वाली धनराशि बढ़ाने की मांग की। उनका कहना है कि पंचायतों को आवंटित बजट का निर्धारण जनसंख्या के साथ-साथ भौगोलिक क्षेत्रफल को भी ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए, ताकि बड़े क्षेत्रफल वाली और अधिक जरूरतों वाली ग्राम पंचायतों को विकास कार्यों के लिए पर्याप्त संसाधन मिल सकें। संगठन ने जिला योजना में ग्राम पंचायतों की भागीदारी सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया। मांग की गई कि जिला योजना के प्रस्ताव ग्राम पंचायत की खुली बैठक में पारित होने चाहिए और ग्राम प्रधान संगठन को जिला योजना में नामित सदस्य बनाया जाना चाहिए। प्रधानों के अनुसार, गांवों की वास्तविक समस्याओं की जानकारी स्थानीय पंचायत प्रतिनिधियों को होती है, इसलिए विकास योजनाओं के निर्धारण में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना जरूरी है।
-29 विभाग पंचायतों को सौंपने और ग्राम प्रधान निधि बनाने की मांग
सचिवालय घेराव के दौरान ग्राम प्रधानों ने पंचायती राज अधिनियम के अंतर्गत आने वाले सभी 29 विभाग पंचायतों को हस्तांतरित करने की मांग प्रमुखता से उठाई। उनका कहना है कि जब ग्राम पंचायतों पर ग्रामीण विकास की जिम्मेदारी है, तो उन्हें उस जिम्मेदारी को निभाने के लिए आवश्यक अधिकार और संसाधन भी उपलब्ध कराए जाने चाहिए। इसके साथ ही विधायक और सांसद निधि की तर्ज पर ग्राम प्रधान निधि गठित करने की मांग की गई, जिससे गांवों की स्थानीय जरूरतों के अनुरूप विकास कार्य कराए जा सकें। संगठन ने दस लाख रुपये तक के विकास कार्यों के लिए ग्राम पंचायत को ही कार्यदायी संस्था बनाए जाने पर जोर दिया। प्रधानों का तर्क है कि स्थानीय स्तर पर छोटे और जरूरी विकास कार्यों को ग्राम पंचायत के माध्यम से कराने से निर्णय प्रक्रिया आसान होगी और गांवों की जरूरतों के अनुसार कार्यों को आगे बढ़ाने में सुविधा मिलेगी।
20 हजार रुपये मानदेय और स्वास्थ्य-जीवन बीमा की मांग
ग्राम प्रधानों ने अपने मानदेय में बढ़ोतरी का मुद्दा भी जोरदार तरीके से उठाया। संगठन ने ग्राम प्रधानों का मानदेय बढ़ाकर 20 हजार रुपये प्रतिमाह करने की मांग की। इसके साथ ही ग्राम प्रधानों के लिए स्वास्थ्य और जीवन बीमा की सुविधा उपलब्ध कराने तथा ग्राम पंचायत के वार्ड सदस्यों को खुली बैठकों में भागीदारी के लिए मानदेय देने की मांग की गई। प्रधानों का कहना है कि पंचायत प्रतिनिधि गांवों की समस्याओं के समाधान के लिए लगातार लोगों के बीच रहते हैं और उन्हें अनेक प्रशासनिक एवं सामाजिक जिम्मेदारियां निभानी पड़ती हैं। ऐसे में उनके मानदेय और सुरक्षा से जुड़ी सुविधाओं पर भी सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए। संगठन ने 16वें वित्त से संबंधित ग्राम पंचायतों पर अनिवार्य टैक्स और 20 प्रतिशत कटौती के आदेश में संशोधन करने की मांग भी उठाई। प्रधानों के अनुसार, पंचायतों के सीमित संसाधनों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ने से विकास कार्यों के लिए उपलब्ध धनराशि प्रभावित हो सकती है।
-पात्र परिवारों को आवास और पंचायतों को वित्तीय राहत देने की मांग
ग्राम प्रधानों ने प्रधानमंत्री आवास प्लस सर्वे-2024 में पात्र पाए गए लाभार्थियों को प्राथमिकता सूची में शामिल करने की मांग भी सरकार के समक्ष रखी। उनका कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक ऐसे परिवार हैं, जिन्हें आवास की आवश्यकता है। ऐसे पात्र परिवारों को योजनाओं का लाभ दिलाने के लिए सूची तैयार करने और प्राथमिकता तय करने की प्रक्रिया में वास्तविक जरूरतों का ध्यान रखा जाना चाहिए। प्रधानों ने वित्तीय आवंटन और कटौती से जुड़े प्रावधानों में बदलाव करने पर भी जोर दिया, ताकि ग्राम पंचायतों के पास स्थानीय विकास कार्यों के लिए पर्याप्त धनराशि उपलब्ध रह सके।
सितारगंज के प्रधानों ने कहा—जिम्मेदारी के साथ अधिकार और संसाधन भी जरूरी
प्रदर्शन में शामिल सितारगंज के ग्राम प्रधानों ने कहा कि ग्राम पंचायतें ग्रामीण विकास की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं। गांवों में सड़क, नाली, पेयजल, स्वच्छता और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़े कार्यों को आगे बढ़ाने में पंचायत प्रतिनिधियों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। ग्रामीण जनता अपनी समस्याओं के समाधान के लिए सबसे पहले ग्राम प्रधान और पंचायत प्रतिनिधियों के पास पहुंचती है, लेकिन पर्याप्त वित्तीय अधिकार और संसाधन नहीं होने के कारण कई बार जरूरी कार्यों को समय पर पूरा कराने में व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि पंचायतों को मजबूत किए बिना गांवों के सर्वांगीण विकास की कल्पना पूरी नहीं हो सकती। इसलिए सरकार को ग्राम प्रधानों की मांगों को केवल संगठन की मांग मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, बल्कि इन्हें ग्रामीण विकास व्यवस्था को बेहतर बनाने से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों के रूप में देखना चाहिए।
-सचिवालय घेराव के बाद सरकार के रुख पर टिकी निगाहें
देहरादून में हुए इस प्रदर्शन के माध्यम से ग्राम प्रधानों ने पंचायतों के अधिकार, वित्तीय संसाधनों, मानदेय और ग्रामीण विकास से जुड़े मुद्दों पर एकजुटता दिखाई। प्रधान संगठन ने सरकार से मांगों पर गंभीरता से विचार कर शीघ्र सकारात्मक निर्णय लेने की अपील की। अब देखना होगा कि सचिवालय घेराव और प्रदर्शन के बाद सरकार ग्राम प्रधानों की मांगों पर क्या रुख अपनाती है और पंचायत प्रतिनिधियों को उनकी मांगों के अनुरूप कितनी राहत मिलती है। प्रदर्शन में परमजीत सिंह प्रधान नकटपुरा, हरप्रीत सिंह हल्दुवा, हरेंद्र सिंह चिकाघाट, जसविंदर सिंह प्रधान बिज्टी सहित सितारगंज क्षेत्र के अनेक ग्राम प्रधान मौजूद रहे।