सलाखों के भीतर उम्मीद की रोशनी: शिक्षा, संगीत और कौशल विकास से कैदियों की ज़िंदगी में नया सवेरा।
14 जनवरी, 2026
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सितारगंज:(चरनसिंह सरारी)केंद्रीय कारागार सितारगंज आज केवल सजा काटने की जगह नहीं, बल्कि बदलाव, सुधार और आत्मनिर्भरता का सशक्त केंद्र बनकर उभर रहा है। यहां शिक्षा और कौशल विकास की अभिनव पहल कैदियों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला रही है और उन्हें अतीत की गलतियों से ऊपर उठकर सम्मानजनक भविष्य की ओर अग्रसर कर रही है। जेल प्रशासन की इस सोच ने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि सही मार्गदर्शन और अवसर दिए जाएं, तो हर व्यक्ति के जीवन में सुधार संभव है।
केंद्रीय कारागार में वर्तमान में करीब 18 सजायाफ्ता कैदी उत्तराखंड बोर्ड के माध्यम से हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। इनके लिए प्रतिदिन चार से पांच घंटे नियमित कक्षाओं का संचालन किया जा रहा है, जहां गणित, अर्थशास्त्र, हिंदी, अंग्रेजी सहित विभिन्न विषयों का अध्ययन कराया जा रहा है। शिक्षा का यह क्रम केवल किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके जरिए कैदियों में अनुशासन, समय प्रबंधन, आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच जैसे गुण भी विकसित किए जा रहे हैं।
शिक्षा की इस यात्रा को आगे बढ़ाते हुए पिछले वर्ष इंटरमीडिएट उत्तीर्ण करने वाले 13 कैदी इस वर्ष इग्नू से बीए की पढ़ाई कर रहे हैं। पढ़ाई कर रहे कैदियों का कहना है कि यह शिक्षा उन्हें जेल से बाहर निकलने के बाद नई पहचान बनाने, रोजगार के बेहतर अवसर पाने और समाज में सम्मानपूर्वक जीवन जीने में सहायक सिद्ध होगी। कई कैदियों ने माना कि जेल में मिली शिक्षा ने उनके सोचने के नजरिए को पूरी तरह बदल दिया है।
शैक्षणिक गतिविधियों के साथ-साथ जेल प्रशासन द्वारा संगीत और कला प्रशिक्षण को भी विशेष महत्व दिया जा रहा है। संगीत प्रशिक्षण ले रहे बंदी गोल्डी सैंथोजी के अनुसार, जेल में गिटार, ढोलक, ड्रम, हारमोनियम और पियानो जैसे आधुनिक व पारंपरिक वाद्य यंत्र उपलब्ध कराए गए हैं। वर्तमान में 19 कैदी प्रतिदिन दो से तीन घंटे संगीत का प्रशिक्षण ले रहे हैं। संगीत के सुरों में कैदियों को न केवल मानसिक शांति मिल रही है, बल्कि उनके तनाव और अवसाद में भी कमी आई है।
जेल प्रशासन का मानना है कि शिक्षा और कला के माध्यम से कैदियों का समग्र विकास संभव है। केंद्रीय कारागार सितारगंज की यह पहल समाज के लिए एक प्रेरणादायक संदेश है कि सुधार, संवेदना और अवसर के सहारे जेलें भी नए जीवन की पाठशाला बन सकती हैं, जहां से कैदी एक बेहतर इंसान बनकर समाज की मुख्यधारा में लौट सके।